SATPAL KAUSHAL
यह सच है कि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम नहीं जान पाते कि हमें कब और कैसे मुश्किलों का सामना करना होगा। पापा जी, जो 89 वर्ष की उम्र में भी बिलकुल तंदरुस्त थे, जिनकी दिनचर्या में हर दिन 5 से 7 किलोमीटर की सैर शामिल थी, जो अपने समय के एक बेहतरीन वेटरन रेसर थे, जिनकी हिम्मत और ऊर्जा को देख कर कभी किसी को यह भी नहीं लगता था कि वह कभी बीमार पड़ सकते हैं—वह अचानक बीमार पड़ गए।
पहले उन्होंने हल्की सी कमजोरी महसूस की, फिर धीरे-धीरे उनका चलना मुश्किल होने लगा, और डॉक्टरों ने टेस्ट करवाए तो पता चला कि उनका लीवर ठीक से काम नहीं कर रहा था। दिल की धड़कन में कोई गड़बड़ी नहीं थी, फिर भी उनका शरीर जवाब देने लगा। लेकिन उनका मन नहीं रुक रहा था। उनकी जिद थी कि वह रोज़ की सैर पर जाएं, वह कनाडा गए तो वहां भी यही महसूस हुआ कि अब घर की यादें बहुत जोर से आ रही हैं, अपने सखा-संगियों को, अपने घर को मिस करने लगे थे।
पापा जी की बेचैनी दिन-ब-दिन बढ़ने लगी, और उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि अब उन्हें भारत लौटना होगा, वह अपने घर में ही शांति महसूस करेंगे। इसके बाद जब पोते की शादी की तारीख तय हुई, तो हमें लगा कि अब वक़्त आ गया है—भारत लौटने का। हम सब ने एक साथ मिल कर उनकी यात्रा का प्लान किया और वह घर लौटने के लिए तैयार हो गए।
यात्रा बहुत लंबी थी, और सफर के दौरान उनकी तबियत बिगड़ती चली गई। हम सबने सोचा कि शायद यह सिर्फ सफर की थकावट है, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, उनका शरीर कमजोर होता गया, पांव में सूजन आ गई, और फिर भूख पूरी तरह से नदारद हो गई। वह सिर्फ सूप और दाल पर जीवित थे, और फिर वह भी न जाने क्यों उनका पेट स्वीकार नहीं कर रहा था। एक दिन ऐसा आया जब वह पानी भी नहीं पी पा रहे थे, सिर्फ कुछ इशारों से हमसे बात कर रहे थे।
हमने उन्हें पोते की शादी में ले जाने का पूरा इंतजाम किया। व्हील चेयर पर बिठा कर, हम उन्हें डांस फ्लोर पर लेकर गए ताकि उनका हौंसला बना रहे, ताकि उनका मन खुश रहे। शादी के बाद भी पापा जी की हालत ठीक नहीं हुई, दिन ब दिन उनकी स्थिति और खराब होती गई। अब वह सिर्फ दाल, सूप और पानी तक ही सीमित थे, लेकिन फिर वह भी धीरे-धीरे सब छोड़ते गए। एक दिन उनका गला भी सूख गया, और बस इशारे करने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। आवाज़ भी कम होती चली गई, और अगले दिन वह पूरी तरह से चुप हो गए, सिर्फ अपनी आंखों से बातें कर रहे थे।
हम सब helpless थे, बस उनकी तकलीफ को देख रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम उन्हें कैसे आराम दे सकते हैं। और फिर, 8 नवंबर की सुबह, साढ़े सात बजे, उनका शरीर स्थिर हो गया। पापा जी हमसे बहुत दूर चले गए, मौत ने उन्हें धीरे-धीरे हमसे दूर किया। हम बस यही देख पा रहे थे कि कैसे वह हमारे बीच से जाते जा रहे थे।
यह सब इतना कठिन था कि शब्द भी उसके सामने बेमानी थे। वह जो ताकतवर इंसान थे, जो जीवन को जीने का अपना तरीका जानते थे, वह अब शांति से इस दुनिया को छोड़ गए। लेकिन एक बात हमेशा याद रखेंगे, पापा जी ने हमें हमेशा सिखाया कि जीवन को साहस के साथ जीना चाहिए, चाहे कुछ भी हो।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह विश्वास होता है कि वह अपनी पूरी जिंदगी का जो साहस और शक्ति का संदेश छोड़ कर गए हैं, वह हमेशा हमारे साथ रहेगा। उनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है, लेकिन हम जानते हैं कि वह हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे।

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