Friday, November 15, 2024

मेरे पापा जी

 



यह कहानी एक **वेटरन रेसर** की है, जिनकी जिंदगी दौड़ और वाक़ के बिना अधूरी थी। जैसे ही सुबह होती, वह किसी भी हालत में अपनी दिनचर्या शुरू कर देते थे। चाहे सर्दी हो, गर्मी हो या बारिश, उनका एक ही लक्ष्य था—चलते रहना और दौड़ते रहना। उनके लिए रेस या वॉक सिर्फ एक शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य बन चुका था। वे जानते थे कि यह उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाता है और उनकी आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

उनकी यह आदत सिर्फ एक शौक नहीं थी, बल्कि उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य उसी पर निर्भर था। कभी-कभी, रेस के आयोजन स्थल तक पहुँचने के लिए उन्हें पाँच-सात किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था, लेकिन किसी भी रुकावट से वह पीछे नहीं हटते थे। बारिश हो या तेज़ धूप, उनका मन सिर्फ एक ही बात पर केंद्रित रहता था—दौड़ना, चलना और सक्रिय रहना।

बचपन से ही खेलों में रुचि रखने वाले इस व्यक्ति ने बॉलीबॉल और फुटबॉल में भी हिस्सा लिया, लेकिन उनकी असली पहचान दौड़ और वॉक में थी। उनका विश्वास था कि यह शारीरिक गतिविधियाँ न केवल शरीर को चुस्त और तंदुरुस्त रखती हैं, बल्कि मन को भी प्रफुल्लित और केंद्रित रखती हैं। इस कारण उनका जीवन एक परिपूर्ण संतुलन बन गया था—शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक।

जब बीमारी ने उन्हें चलने में असमर्थ किया, तो भी उनका मनोबल कमजोर नहीं हुआ। वे हमेशा यही कहते, "मैं ठीक हो जाऊंगा, फिर सैर पर जाऊंगा।" यही उनका जज़्बा था, जो उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता था। उनका विश्वास था कि चाहे शारीरिक रूप से कितना भी मुश्किल हो, अगर मानसिकता सही हो, तो हम हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। 

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, अगर हमारी मानसिकता मजबूत हो, तो हम हर परिस्थिति से बाहर निकल सकते हैं। यह न केवल एक व्यक्ति की कड़ी मेहनत और संघर्ष की कहानी है, बल्कि हमें यह याद दिलाती है कि कभी हार नहीं माननी चाहिए और चलते रहना चाहिए—शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से।



Tuesday, November 12, 2024


          SATPAL KAUSHAL

 यह सच है कि जीवन के किसी भी मोड़ पर हम नहीं जान पाते कि हमें कब और कैसे मुश्किलों का सामना करना होगा। पापा जी, जो 89 वर्ष की उम्र में भी बिलकुल तंदरुस्त थे, जिनकी दिनचर्या में हर दिन 5 से 7 किलोमीटर की सैर शामिल थी, जो अपने समय के एक बेहतरीन वेटरन रेसर थे, जिनकी हिम्मत और ऊर्जा को देख कर कभी किसी को यह भी नहीं लगता था कि वह कभी बीमार पड़ सकते हैं—वह अचानक बीमार पड़ गए। 

पहले उन्होंने हल्की सी कमजोरी महसूस की, फिर धीरे-धीरे उनका चलना मुश्किल होने लगा, और डॉक्टरों ने टेस्ट करवाए तो पता चला कि उनका लीवर ठीक से काम नहीं कर रहा था। दिल की धड़कन में कोई गड़बड़ी नहीं थी, फिर भी उनका शरीर जवाब देने लगा। लेकिन उनका मन नहीं रुक रहा था। उनकी जिद थी कि वह रोज़ की सैर पर जाएं, वह कनाडा गए तो वहां भी यही महसूस हुआ कि अब घर की यादें बहुत जोर से आ रही हैं, अपने सखा-संगियों को, अपने घर को मिस करने लगे थे। 

पापा जी की बेचैनी दिन-ब-दिन बढ़ने लगी, और उन्हें ऐसा महसूस होने लगा कि अब उन्हें भारत लौटना होगा, वह अपने घर में ही शांति महसूस करेंगे। इसके बाद जब पोते की शादी की तारीख तय हुई, तो हमें लगा कि अब वक़्त आ गया है—भारत लौटने का। हम सब ने एक साथ मिल कर उनकी यात्रा का प्लान किया और वह घर लौटने के लिए तैयार हो गए। 

यात्रा बहुत लंबी थी, और सफर के दौरान उनकी तबियत बिगड़ती चली गई। हम सबने सोचा कि शायद यह सिर्फ सफर की थकावट है, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, उनका शरीर कमजोर होता गया, पांव में सूजन आ गई, और फिर भूख पूरी तरह से नदारद हो गई। वह सिर्फ सूप और दाल पर जीवित थे, और फिर वह भी न जाने क्यों उनका पेट स्वीकार नहीं कर रहा था। एक दिन ऐसा आया जब वह पानी भी नहीं पी पा रहे थे, सिर्फ कुछ इशारों से हमसे बात कर रहे थे। 

हमने उन्हें पोते की शादी में ले जाने का पूरा इंतजाम किया। व्हील चेयर पर बिठा कर, हम उन्हें डांस फ्लोर पर लेकर गए ताकि उनका हौंसला बना रहे, ताकि उनका मन खुश रहे। शादी के बाद भी पापा जी की हालत ठीक नहीं हुई, दिन ब दिन उनकी स्थिति और खराब होती गई। अब वह सिर्फ दाल, सूप और पानी तक ही सीमित थे, लेकिन फिर वह भी धीरे-धीरे सब छोड़ते गए। एक दिन उनका गला भी सूख गया, और बस इशारे करने के अलावा कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। आवाज़ भी कम होती चली गई, और अगले दिन वह पूरी तरह से चुप हो गए, सिर्फ अपनी आंखों से बातें कर रहे थे। 

हम सब helpless थे, बस उनकी तकलीफ को देख रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम उन्हें कैसे आराम दे सकते हैं। और फिर, 8 नवंबर की सुबह, साढ़े सात बजे, उनका शरीर स्थिर हो गया। पापा जी हमसे बहुत दूर चले गए, मौत ने उन्हें धीरे-धीरे हमसे दूर किया। हम बस यही देख पा रहे थे कि कैसे वह हमारे बीच से जाते जा रहे थे। 

यह सब इतना कठिन था कि शब्द भी उसके सामने बेमानी थे। वह जो ताकतवर इंसान थे, जो जीवन को जीने का अपना तरीका जानते थे, वह अब शांति से इस दुनिया को छोड़ गए। लेकिन एक बात हमेशा याद रखेंगे, पापा जी ने हमें हमेशा सिखाया कि जीवन को साहस के साथ जीना चाहिए, चाहे कुछ भी हो।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह विश्वास होता है कि वह अपनी पूरी जिंदगी का जो साहस और शक्ति का संदेश छोड़ कर गए हैं, वह हमेशा हमारे साथ रहेगा। उनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है, लेकिन हम जानते हैं कि वह हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे।

मेरे पापा जी

  यह कहानी एक **वेटरन रेसर** की है, जिनकी जिंदगी दौड़ और वाक़ के बिना अधूरी थी। जैसे ही सुबह होती, वह किसी भी हालत में अपनी दिनचर्या शुरू कर...